Monday, March 26, 2018

न्यायपालिका के स्वर्णिम इतिहास


न्यायपालिका के स्वर्णिम इतिहास में दिनाॅक 12 जनवरी 2018 शुक्रवार का दिन कालिक पोत गया। जिसमें उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायधीशों ने प्रेस काॅन्फ्रेस बुला कर न्यायपालिका में सब कुछ ठीक न होने एंव चलने के लिए गुहार लगायी एंव मुख्य न्यायधीश के खिलाफ ड़का बजा दिया है। लोेकतन्त्र की दुहाई देते हुए कहा कि लोकतन्त्र खतरे में है। जिस प्रकार चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस काॅन्फ्रेस बुलायी उससे तो यही लगता है कि न्यायपालिका के अन्दर सब कुछ ठीक नही चल रहा है। और इन चारो न्यायधीशों की क्या मजबुरी रही होगी इन्होंने देश की जनता के सामने इस प्रकार अपने मजबुरीयों को रखा है। लेकिन इनके पास मुख्य न्यायधीश से बात करके एंव अगर बात न बनती तो राष्ट्रपति के पास जा कर अपनी परेशानियों एंव दिक्कतों को रख सकते थे लेकिन इन्होंने इसे सार्वजनिक कर एक बहस को जन्म दे दिया है कि न्यायपालिका के अन्दर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और अब संसद और सरकार को हस्तक्षेप करके इस परेशानी का हल निकालना होगा। 

देश के चार स्तम्भों में से एक का कमजोर होना देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है 1985 के बाद न्यायपालिका का कद काफी बड़ा है और आम जन मानुस का न्यायापालिका के ऊपर अपार विश्वास बढ़ता चला गया आम आदमी की आस और विश्वास का प्रतीक बने इस न्याय के मन्दिर में हल-चल होना अस्वभावीक नहीं है। हितो के टकराव के कारण इसकी अखण्डता और प्रभुस्ता को इस घटना से ठेस पहुची है जो कि देशहित में ठीक नहीं है। आम आदमी की आस एंव विश्वास का प्रतीक है न्यायपालिका। 

भारत देश में कई बार देश के सामने कई कठिन समस्याये आयी जिसे न्यायपालिका ने स्वतः संज्ञान में लेकर एंव देशहित के लिए आगे आके और आम जनमानस के विश्वास को खड़ित नही होने दिया। जिससे देश में आम जनता का विश्वास न्यायपालिका के उपर बढ़ता ही चला गया। देश में कई ऐसे मौके आये जब देश में गठबधन की सरकारें रही और सरकार स्वतंत्र रूप से फैसले नही ले पायी तब न्यायपालिका ने लोकतत्र के लिए सरकार को आईना दिखाया। सरकारों ने गठबंधन धर्म को निभाना पड़ा और इससे सरकार को मजबुरी कई बार फैसले लेने पड़ते थे। न्यायापालिका ने चाहे किसानों के मामले हो या गरीबी हो या 2जी0 स्पेक्ट्रम घोटले, काम्नवेल्थ गेम्स घोटाले में एंव आई0 पी0 एल0 के मामले मे स्वतः संज्ञान में लेते हुए सरकार को आईना दिखाया। 

उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगाना एंव अरूणाचल में सरकार का गिरने को लेकर सुप्रिम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर फ्लोर टेस्ट करवाना न्यायपालिका ने अपना कद बढ़ाया है।

न्यायपालिका में जो आम जनमानस का विश्वास था उसको ठेस पहुॅची है। जिससे अब आम जनमानस की आस्था और विश्वास को जो ठेस पहॅुची है और न्याय के मन्दिर की गरिमा तार-तार हुई है। उस आस्था और विश्वास को वापस लाने के लिए सरकार और न्यायपालिका को खुद अपने आप में सुधार करना होगा ताकि न्यायधीश के हितो का टकराव न हो और उनकी गरिमा पर किसी भी प्रकार की आॅच न पहुॅचें।

चार न्यायधीशों का सामने आने पर देश की जनता और सरकार जिस तस तरह मुक दर्शक बनी हुई है, वह भी ठीक नहीं है। न्यायधीशों के हितो के टकराव को रोकने के लिए एक ठोस पहल करनी होगी ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटना न हो सके क्योंकि आज भारत में न्यायपालिका के ऊपर आम जनमानस का विश्वास एक मन्दिर की तरह है और उसको ढ़ीकने नही देना चाहिए। चाहे उसके लिए सरकार को कानून ही क्यों न बनाना पड़े।

इलेक्ट्रानिक बुक


ई लाइबे्ररी की अवधारणा के कारण आज सब कुछ डिजिटल होता जा रहा है, वही वर्तमान में किताबों का स्वरूप बदल गया है। तकनीकी के इस युग में ई बुक्स अर्थात इलेक्ट्रानिक बुक जिसे डिजिटल डाॅक्यूमेट की तरह स्मार्टफोन या लैपटाॅप पर पढ़ा जा सकता है। ये बुक कई  फाइल फार्मेट में होती है जिनमें प्रमुखतः पोर्टबल डाॅक्यूमेंट फाॅर्मेट (पीडीएफ) एंव एक्सपीएस आदि शामिल है। ई बुक्स के अलावा आजकल आडियो बुक्स का भी चलन काफी मात्रा में हो रहा है, युवाओं के द्वारा इसे काफी पंसद किया जा रहा है। अमेजन ने इसके आडियो बुक्स के ऊपर काफी काम किया है इनके पास ई बुक्स का भी काफी बड़ा सकलंन है। आॅडियो बुक्स की प्रचलित बेव साइट निम्न हैं

आॅडिबल 
लिब्रिवाॅक्स
डाउनपोर 
टोपन कल्चर
स्क्रिबल








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कानून


देश में बड़ी विडम्बना है सरकार गरीब आदमी के लिए बनती है टैक्स और लूट खसोट करने वाले लोगों का सरकार कुछ नहीं कर पाती है। चाहे विजय माल्या हो या नीरव मोदी, ललीत मोदी, हो इन सब ने देश का खरबों रू0 चूना लगा कर देश से चम्पत हो गये है भाजपा सरकार हो या काॅग्रेस सरकार इन्होंने इनका कुछ नहीं कर पाया। इससे तो यही लगाता है कि कानून सिर्फ गरीब और असाय लोगों के लिए बनता है ताकि वह चोरी न कर पाये। अमीर आदमी तो बार-बार कानून की धज्जियाॅ उड़ाते हैं, कानून को अपने हाथों की कठपुतली समझतें हैं। कानून के दाव-पेचों से अपने को बचा लेते हैं।


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Friday, March 2, 2018

न्यायपालिका




न्यायपालिका के स्वर्णिम इतिहास में दिनाॅक 12 जनवरी 2018 शुक्रवार का दिन कालिक पोत गया। जिसमें उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायधीशों ने प्रेस काॅन्फ्रेस बुला कर न्यायपालिका में सब कुछ ठीक न होने एंव चलने के लिए गुहार लगायी एंव मुख्य न्यायधीश के खिलाफ ड़का बजा दिया है। लोेकतन्त्र की दुहाई देते हुए कहा कि लोकतन्त्र खतरे में है। जिस प्रकार चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस काॅन्फ्रेस बुलायी उससे तो यही लगता है कि न्यायपालिका के अन्दर सब कुछ ठीक नही चल रहा है। और इन चारो न्यायधीशों की क्या मजबुरी रही होगी इन्होंने देश की जनता के सामने इस प्रकार अपने मजबुरीयों को रखा है। लेकिन इनके पास मुख्य न्यायधीश से बात करके एंव अगर बात न बनती तो राष्ट्रपति के पास जा कर अपनी परेशानियों एंव दिक्कतों को रख सकते थे लेकिन इन्होंने इसे सार्वजनिक कर एक बहस को जन्म दे दिया है कि न्यायपालिका के अन्दर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और अब संसद और सरकार को हस्तक्षेप करके इस परेशानी का हल निकालना होगा।

देश के चार स्तम्भों में से एक का कमजोर होना देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है 1985 के बाद न्यायपालिका का कद काफी बड़ा है और आम जन मानुस का न्यायापालिका के ऊपर अपार विश्वास बढ़ता चला गया आम आदमी की आस और विश्वास का प्रतीक बने इस न्याय के मन्दिर में हल-चल होना अस्वभावीक नहीं है। हितो के टकराव के कारण इसकी अखण्डता और प्रभुस्ता को इस घटना से ठेस पहुची है जो कि देशहित में ठीक नहीं है। आम आदमी की आस एंव विश्वास का प्रतीक है न्यायपालिका।

भारत देश में कई बार देश के सामने कई कठिन समस्याये आयी जिसे न्यायपालिका ने स्वतः संज्ञान में लेकर एंव देशहित के लिए आगे आके और आम जनमानस के विश्वास को खड़ित नही होने दिया। जिससे देश में आम जनता का विश्वास न्यायपालिका के उपर बढ़ता ही चला गया। देश में कई ऐसे मौके आये जब देश में गठबधन की सरकारें रही और सरकार स्वतंत्र रूप से फैसले नही ले पायी तब न्यायपालिका ने लोकतत्र के लिए सरकार को आईना दिखाया। सरकारों ने गठबंधन धर्म को निभाना पड़ा और इससे सरकार को मजबुरी कई बार फैसले लेने पड़ते थे। न्यायापालिका ने चाहे किसानों के मामले हो या गरीबी हो या 2जी0 स्पेक्ट्रम घोटले, काम्नवेल्थ गेम्स घोटाले में एंव आई0 पी0 एल0 के मामले मे स्वतः संज्ञान में लेते हुए सरकार को आईना दिखाया। उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगाना एंव अरूणाचल में सरकार का गिरने को लेकर सुप्रिम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर फ्लोर टेस्ट करवाना न्यायपालिका ने अपना कद बढ़ाया है।



न्यायपालिका में जो आम जनमानस का विश्वास था उसको ठेस पहुॅची है। जिससे अब आम जनमानस की आस्था और विश्वास को जो ठेस पहॅुची है और न्याय के मन्दिर की गरिमा तार-तार हुई है। उस आस्था और विश्वास को वापस लाने के लिए सरकार और न्यायपालिका को खुद अपने आप में सुधार करना होगा ताकि न्यायधीश के हितो का टकराव न हो और उनकी गरिमा पर किसी भी प्रकार की आॅच न पहुॅचें। चार न्यायधीशों का सामने आने पर देश की जनता और सरकार जिस तस तरह मुक दर्शक बनी हुई है, वह भी ठीक नहीं है। न्यायधीशों के हितो के टकराव को रोकने के लिए एक ठोस पहल करनी होगी ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटना न हो सके क्योंकि आज भारत में न्यायपालिका के ऊपर आम जनमानस का विश्वास एक मन्दिर की तरह है और उसको ढ़ीकने नही देना चाहिए। चाहे उसके लिए सरकार को कानून ही क्यों न बनाना पड़े।


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